Wednesday, October 14, 2026

और जब तुम भी पत्थर बन जाओगे












सुबह ढली, दोपहर शाम में बदल गईं..

फिर गहराती गईं रात... 

फिर चाँद डुबा..तारे गुम हो गये... पर हम है वही रहें, तुम्हारी राह तकते..


कभी तो उस मोड़ पर आओगी वापस, जहा हम मिलने वाले थे... 

वो मिल का पत्थर होगा, और एक पत्थर मिलेगा वहां.. मै.


ले जाना उस पत्थर को,

तुम्हारे कमरे के बाहर, सीढ़ियों पर छोड़ देना... और रोज उसे छूते चले जाना..

या तुम्हारे आंगन में डाल देना, बस यूं ही बेकार सा समझ कर...

देखना, मौसम और वक्त उसमें मुझे तराश लेंगे फिर....


मेरे नैन नक्श तो पहचान पाओगी ना इतने गुजरे हुए सालों बाद?

ना भी पाओ, तो कोई बात नहीं, उस बुत को कही सजा देना..

और लोगों को बताना कि ये तुम्हारी कलाकारी है, तुमने , तुम्हारे इंतज़ार ने और वक्त ने मिलकर तराशा है इसे..


लोग उसमें भी तुम्हे ढूंढेंगे.. तुम्हारे निशाँ..

पर डरो नहीं, वो कही अंदर दबे रहेगे, पड़े रहेंगे... उसे वक्त, और तुम छू भी नहीं पाओगे


फिर कभी, सदियों बाद जब तुम पत्थर बन जाओगे, तब शायद हम मिल पाए..


#मोहा

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